सोमवार, 1 दिसंबर 2014

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है , चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था , दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए , पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली।

एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी , किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।

किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।

राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – ” मैं एक राहगीर हूँ , मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं , चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो। “
किसान – ” ना – ना सेठ जी , ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं , इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें , मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं। “
किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी , वह बोला , ” धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं ?”
“सेठ जी , मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ , और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ… “, किसान बोला।
“क्या ? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं , और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं , यह कैसे संभव है !” , राजा ने अचरज से पुछा।
” सेठ जी”, किसान बोला ,” प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है …. प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है। “
” तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो ?, राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया।
किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया , ”
इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ , दुसरे से कर्ज चुका देता हूँ , तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ ….”

राजा सोचने लगा , उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था , पर वो जा चुका था।

राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।
दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया , अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।
बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।

राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया।

” मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ , और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ;  बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ?” , राजा ने प्रश्न किया।

किसान बोला ,” हुजूर , जैसा की मैंने बताया था , मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ , यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दुसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ , यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ , तीसरा मैं उधार दे देता हूँ , यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ , यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ। “

राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था , वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।

मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है ? पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं , लाइफ को बैलेंस्ड बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे !

शनिवार, 1 नवंबर 2014

नजरिया

एक महान लेखक अपने लेखन कक्ष में बैठा हुआ लिख रहा था।
1) पिछले साल मेरा आपरेशन हुआ और मेरा गालब्लाडर निकाल दिया गया। इस आपरेशन के कारण बहुत लंबे समय तक बिस्तर पर रहना पड़ा।

2) इसी साल मैं 60 वर्ष का हुआ और मेरी पसंदीदा नौकरी चली गयी। जब मैंने उस प्रकाशन संस्था को छोड़ा तब 30 साल हो गए थे मुझे उस कम्पनी में काम करते हुए।
3) इसी साल मुझे अपने पिता की मृत्यु का दुःख भी झेलना पड़ा।
4) और इसी साल मेरा बेटा कार एक्सिडेंट हो जाने के कारण मेडिकल की परीक्षा में फेल हो गया क्योंकि उसे बहुत दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा। कार की टूट फूट का नुकसान अलग हुआ।

अंत में लेखक ने लिखा,
**वह बहुत ही बुरा साल था।


जब लेखक की पत्नी लेखन कक्ष में आई तो उसने देखा कि, उसका पति बहुत दुखी लग रहा है और अपने ही विचारों में खोया हुआ है। अपने पति की कुर्सी के पीछे खड़े होकर उसने देखा और पढ़ा कि वो क्या लिख रहा था।
वह चुपचाप कक्ष से बाहर गई और थोड़ी देर बाद एक दूसरे कागज़ के साथ वापस लौटी और वह कागज़ उसने अपने पति के लिखे हुए कागज़ के बगल में रख दिया।
लेखक ने पत्नी के रखे कागज़ पर देखा तो उसे कुछ लिखा हुआ नजर आया, उसने पढ़ा।
1-a) पिछले साल आखिर मुझे उस गालब्लाडर से छुटकारा मिल गया जिसके कारण मैं कई सालों से दर्द से परेशान था।
2-a) इसी साल मैं 60 वर्ष का होकर स्वस्थ दुरस्त अपनी प्रकाशन कम्पनी की नौकरी से सेवानिवृत्त हुआ। अब मैं पूरा ध्यान लगाकर शान्ति के साथ अपने समय का उपयोग और बढ़िया लिखने के लिए कर पाउँगा।
3-a) इसी साल मेरे 95 वर्ष के पिता बगैर किसी पर आश्रित हुए और बिना गंभीर बीमार हुए परमात्मा के पास चले गए।
4-a) इसी साल भगवान् ने एक्सिडेंट में मेरे बेटे की रक्षा की। कार टूट फूट गई लेकिन मेरे बच्चे की जिंदगी बच गई। उसे नई जिंदगी तो मिली ही और हाँथ पाँव भी सही सलामत हैं।

अंत में उसकी पत्नी ने लिखा था,
**इस साल भगवान की हम पर बहुत कृपा रही, साल अच्छा बीता।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

मंत्री जी का साला - व्यंग

पुलिस विभाग में भर्ती प्रक्रिया चल रही थी। भर्ती प्रक्रिया मे मंत्री जी का साला भी भाग ले रहा था। स्वभाविक था सब अपनी ओर से जो कर सकते थे, करने का प्रयास कर रहे थे।

500 मीटर की रेस पूरी हुई। मंत्री जी के साले साहब ने 4:30 मिनट में रेस पूरी की। उपनिरीक्षक ने लिस्ट बनाते समय 4:00 मिनट दिया।

लिस्ट जब आफिस पहुँची तो अधिकारी ने देखा 4:00 मिनट में रेस पूरी की है। उसने उसे 3:30 मिनट कर दिया।

इसी प्रकार जब लिस्ट डी.एस.पी, एस.पी, डी.आई.जी से होती हुई आई.जी के पास पहुँची तब समय 1:35 मिनट तक हो गया था।

आई.जी ने जैसे ही लिस्ट को देखा तो वह चौंक पड़े। 
उन्होंने अपने पी.ए से पूछा -- "यह कौन है, जिसने 1:35 मिनट में रेस पूरी की है ??"

पी.ए ने बताया मंत्री जी का साला है।
आई.जी बोले -- "वो तो ठीक है, पर गधों विश्व रिकार्ड का तो ध्यान रखते !!"
 

सोमवार, 1 सितंबर 2014

आज के झूठे दिखावे पतन की और

इंसान पहले गरीब होता है
फिर कुछ पैसा कमा लेता है
उसके बाद खुद की दूकान लेता है
फिर मकान खरीदता है 


उसके बाद कमाई चालु रहे तो उसके मन में विचित्र फितरत पैदा होती है

स्टैण्डर्ड मेन्टेन की 

इसके लिए वो हर चीज ब्रांडेड खरीदता है
चाहे वो कपडा मोबाइल गाडी या घडी हो !

यहीं से उसका पतन शुरू होता है
उसका आधा पैसा इसलिए खर्च होता है की वो दुनिया को दिखा सके की वो पैसे वाला है !

फिर जब थोडा गलत समय आ जाए तो उसको अपना स्टैण्डर्ड मेन्टेन करने में दिक्कत आती है और इंसान अपने बुरे समय को कोसना शुरू कर देता है !

अरे भाई अपने शौक सिमित रखिये ताकि आपको बुरे समय में ज्यादा तकलीफ न हो !
बाकी समय तो समय है, आज तक किसी का नहीं हुआ !
चढता सूरज भी ढल जाता है तो इंसानों की क्या औकात ?



शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

माँ तो माँ होती है! - व्यंग

पति के घर में प्रवेश करते ही
पत्नी का गुस्सा फूट पड़ा :

"पूरे दिन कहाँ रहे? आफिस में पता किया, वहाँ भी नहीं पहुँचे! मामला क्या है?"
"वो-वो... मैं..."
पति की हकलाहट पर झल्लाते हुए पत्नी फिर बरसी, "बोलते नही? कहां चले गये थे। ये गंन्दा बक्सा और कपड़ों की पोटली किसकी उठा लाये?"
"वो मैं माँ को लाने गाँव चला गया था।"
पति थोड़ी हिम्मत करके बोला।
"क्या कहा? तुम्हारी मां को यहां ले आये? शर्म नहीं आई तुम्हें? तुम्हारे भाईयों के पास इन्हे क्या तकलीफ है?"
आग बबूला थी पत्नी!
उसने पास खड़ी फटी सफेद साड़ी से आँखें पोंछती बीमार वृद्धा की तरफ देखा तक नहीं।
"इन्हें मेरे भाईयों के पास नहीं छोड़ा जा सकता। तुम समझ क्यों नहीं रहीं।"
पति ने दबीजुबान से कहा।
"क्यों, यहाँ कोई कुबेर का खजाना रखा है? तुम्हारी सात हजार रूपल्ली की पगार में बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च कैसे चला रही हूँ, मैं ही जानती हूँ!"
पत्नी का स्वर उतना ही तीव्र था।
"अब ये हमारे पास ही रहेगी।"
पति ने कठोरता अपनाई।
"मैं कहती हूँ, इन्हें इसी वक्त वापिस छोड़ कर आओ। वरना मैं इस घर में एक पल भी नहीं रहूंगी और इन महारानीजी को भी यहाँ आते जरा भी लाज नहीं आई?"
कह कर पत्नी ने बूढी औरत की तरफ देखा, तो पाँव तले से जमीन ही सरक गयी!
झेंपते हुए पत्नी बोली:
"मां, तुम?"
"हाँ बेटा! तुम्हारे भाई और भाभी ने मुझे घर से निकाल दिया। दामाद जी को फोन किया, तो ये मुझे यहां ले आये।"
बुढ़िया ने कहा, तो पत्नी ने गद्गद् नजरों से पति की तरफ देखा और मुस्कराते हुए बोली।
"आप भी बड़े वो हो, डार्लिंग! पहले क्यों नहीं बताया कि मेरी मां को लाने गये थे?"


रविवार, 13 जुलाई 2014

हिंदू परम्पराओं से जुड़े वैज्ञानिक तर्क


1- कान छिदवाने की परम्परा:
भारत में लगभग सभी धर्मों में कान छिदवाने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क-
दर्शनशास्त्री मानते हैं कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है।जबकि डॉक्टरों का मानना है कि इससे बोली अच्छी होती है और कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है।
 
2- माथे पर कुमकुम/तिलक
महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोशिकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता
 
3-जमीन पर बैठकर भोजन:
भारतीय संस्कृति के अनुसार जमीन पर बैठकर भोजन करना अच्छी बात होती है।
वैज्ञानिक तर्क- पालथी मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस पोजीशन में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त अगर दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया
अच्छी रहती है। इस पोजीशन में बैठते ही खुद-ब-खुद दिमाग से एक सिगनल पेट तक जाता है, कि वह भोजन के लिए तैयार हो जाये।
 
4- हाथ जोड़कर नमस्ते करना:
जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा
नमस्कार करते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जब सभी उंगलियों के शीर्ष एक दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। एक्यूप्रेशर के कारण उसका सीधा असर हमारी आंखों, कानों और
दिमाग पर होता है, ताकि सामने वाले व्यक्ति को हम लंबे समय तक याद रख सकें।
दूसरा तर्क यह कि हाथ मिलाने
(पश्चिमी सभ्यता) के बजाये अगर आप नमस्ते करते हैं तो सामने वाले के शरीर के कीटाणु आप तक नहीं पहुंच सकते। अगर सामने वाले को स्वाइन फ्लू भी है तो भी वह वायरस
आप तक नहीं पहुंचेगा।
 
5-: भोजन की शुरुआत तीखे से अंत मीठे से:
जब भी कोई धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान होता है तो भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से होता है।
वैज्ञानिक तर्क- तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।
 
6- पीपल की पूजा:
तमाम लोग सोचते हैं कि पीपल की पूजा करने से भूत-प्रेत दूर भागते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- इसकी पूजा इसलिये की जाती है, ताकि इस पेड़ के प्रति लोगों का सम्मान बढ़े और उसे काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा पेड़ है, जो रात में भी ऑक्सीजन प्रवाहित करता है।
 
7- दक्षिण की तरफ सिर करके सोना:
दक्षिण की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो लोग कहते हैं कि बुरे सपने आयेंगे, भूत प्रेत का साया आ जायेगा, आदि। इसलिये उत्तर की ओर पैर करके सोयें।
वैज्ञानिक तर्क-: जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। इससे अलजाइमर, परकिंसन, या दिमाग संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। यही
नहीं रक्तचाप भी बढ़ जाता है।
 
8-सूर्य नमस्कार:
हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।
वैज्ञानिक तर्क- पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की
रौशनी अच्छी होती है।
 
9-सिर पर चोटी या शिखा:
हिंदू धर्म में ऋषि मुनि चुटिया रखते थे। आज भी लोग रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- जिस जगह पर चुटिया रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती हैं। इससे दिमाग स्थिर रहता है।इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है।
 
10-व्रत रखना
कोई भी पूजा-पाठ या त्योहार होता है, तो लोग व्रत रखते हैं।
वैज्ञानिक तर्क- आयुर्वेद के अनुसार व्रत करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से शरीर का
डीटॉक्सीफिकेशन होता है, यानी उसमें से खराब तत्व बाहर निकलते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय रोगों, मधुमेह, आदि रोग भी जल्द नहीं लगते।
 
11-चरण स्पर्श करना:
हिंदू मान्यता के अनुसार जब भी आप किसी बड़े से मिलें, तो उसके चरण स्पर्श करें। हम बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे बड़ों का आदर करें।
वैज्ञानिक तर्क- मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉसमिक एनर्जी का प्रवाह कहते हैं। इसमें दो प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह होता है, या तो बड़े के पैरों से होते हुए
छोटे के हाथों तक या फिर छोटे के हाथों से बड़ों के पैरों तक।
 
12- शादीशुदा हिंदू महिलाएं सिंदूर लगाती हैं।
वैज्ञानिक तर्क- सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी होता है।यह मिश्रण शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित करता है। चूंकि इससे यौन उत्तेजनाएं भी बढ़ती हैं, इसीलिये विधवा औरतों के लिये सिंदूर लगाना वर्जित है। इससे स्ट्रेस कम होता है।
 
13- तुलसी के पेड़ की पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्धि आती है। सुख शांति बनी रहती है।
वैज्ञानिक तर्क- तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।लिहाजा अगर घर में पेड़ होगा, तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे बीमारियां दूर होती हैं।

बुधवार, 2 जुलाई 2014

नेता और आदमी - व्यंग

एक नेताजी अपने घर के दरवाजे पर खड़े थे ,
तभी एक प्यासा आदमी आया और बोला -:
"भाई साहब ! प्यासा हूँ...
पानी पिला देंगे...??"
नेताजी ने कहा -: "अभी घर में
आदमी नहीं हैं ...!!!"
.
यह कहकर नेताजी मोबाइल पर बात करने लगे ,
जब वह मोबाइल पर बात कर चुके तब उस
आदमी ने फिर कहा -:
"भाई साहब पानी पिला दीजिए...!!"
.
नेताजी ने कहा -: "तुमको बोला ना कि घर
में कोई.आदमी नही है...!!"
.
वो प्यासा आदमी बहुत प्यार से बोला -:
"भाई साहब.थोड़ी देर के लिये आप
ही आदमी बन.जाइये....!!



रविवार, 1 जून 2014

रेप मुक्त भारत

एक लङकी थी रात को आँफिस से वापस लोट रही थी
देर भी हो गई थी...
पहली बार ऐसा हुआ
ओर काम भी ज्यादा था तो टाइम का पता ही नही चला
वो सीधे auto stand पहुँची
वहाँ एक लङका खङा था
वो लङकी उसे देखकर डर गई की कही उल्टा सीधा ना हो जाए
 
 तभी वो लङका पास आया ओर कहा 
बहन तू मौका नही जिम्मेदारी हे मेरी ओर जब तक तुझे कोई गाङी नही मिल जाती मैँ तुम्हे छोङकर  कहीँ नही जाउँगा


वहाँ से एक ओटो वाला  गुजर रहा था
लङकी को अकेली लङके के साथ देखा तो तुरंत ओटो रोक दी
ओर कहा कहाँ जाना हे मेडम
आइये मे आपको छोङ देता हुँ
लङकी ओटो मे बेठ गई

रास्ते मे वो ओटो वाला बोला तुम मेरी बेटी जैसी हो इतनी रात को तुम्हे अकेला देखा
तो ओटो रोक दी आजकल जमाना खराब हेना और अकेली लङकी मौका नही जिम्मेदारी होती हे

लङकी जहाँ रहती थी  वो एरिया आ चुका था वो ओटो से उतर गई
ओर ओटो वाला चला गया
लेकिन अब भी लङकी को दो अंधेरी गली से होकर गुजरना था
वहाँ से सिर्फ चलकर गुजरना था 
तभी वहाँ से पानीपुरी वाला  गुजर रहा था
शायद वो भी काम से वापस घर की ओर गुजर रहा था

लङकी को अकेली देखकर कहा आओ मेँ तुम्हे घर तक छोङ देता हुँ
उसने अपने  ठेले को वही छोङकर एक टोर्च लेकर उस लङकी के साथ  अंधेरी गली की और निकल पङा
वो लङकी घर पहुँच चुकी थी
आज किसी की बेटी , बहन सही सलामत घर पहुँच चुकी थी

मेरे भारत को तलाश हे
ऐसे तीन लोगो की

1)  वो लङका जो
बस स्टेड पर खङा था

2) वो ओटो वाला ओर

3) वो पानीपुरी वाला

जिस दिन ये तीन लोग मिल जाएगे
उस दिन मेरे भारत मेँ रेप होना बंद हो जाएंगे

गुरुवार, 1 मई 2014

अपने अंदर राम को ढूंढे

रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर
सीता ने रावण की तरफ एक
बार देखा तक नहीं..!
 

तब मंदोदरी ने उपाय बताया कि तुम राम बन के सीता के
पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी..!
 

रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हू..!
मंदोदरी - तब क्या सीता ने आपकी ओर देखा..?
रावण - मैं खुद सीता को नहीं देख सका..!

क्योंकि मैं जब- जब राम बनता हूँ,
मुझे परायी नारी अपनी माता और
अपनी पुत्री सी दिखती है..!
.
अपने अंदर राम को ढूंढे,
और उनके चरित्र पर चलिए..!
आपसे भूलकर भी भूल नहीं होगी..!
.
॥ जय श्री राम ॥

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

माहौल का व्यक्तित्व पर प्रभाव

रामायण मे दो ऐसे व्यक्ती थे...
एक विभीषण और एक कैकेयी...
 

विभीषण रावण के राज मे रहता था
फिर भी नही बिगडा...
 

कैकेयी राम के राज मे रहती
थी
फिर भी नही सुधरी..!!
 

तात्पर्य...
सुधरना एवं बिगडना केवल मनुष्य के सोच और स्वभाव पर निर्भर
होता है
माहौल पर नहीं..

शनिवार, 1 मार्च 2014

समझदार बहु



एक नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो उसकी सास बोली : बींदणी कल माता के मन्दिर में चलना है।
बहू ने पूछा : सासु माँ एक तो माँ जिसने मुझे जन्म दिया और एक आप हो, और कोनसी माँ है ?
सास बढ़ी खुश हुई की मेरी बहू तो बहुत सीधी है।
सास ने कहा : बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है सब औरते जायगी हम भी चलेगे । 



सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है।
आगे सास पीछे बहु।
जैसे ही मन्दिर आया तो बहु ने मन्दिर पर लगे एक चित्र को देखकर कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है मै बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालेंगे?
सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा की बहु तो "पागल" है और बोली : बेटा ये फोटो है वो भी पत्थर की और ये दूध नही दे सकती। चलो आगे।



मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी ।

फिर बहू ने कहा : माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा ?
सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फुट गया और बोली : बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?



चलो अंदर चलो मन्दिर में और सास बोली बेटा ये माता है और इससे मांग लो। यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी।
बहू ने कहा : माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है?
जब पत्थर की गाय दूध नही दे सकती?
पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता?
पत्थर का शेर खा नही सकता?
तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है?


अगर दे सकती है तो आप ...
आप मुझे आशीर्वाद दीजिये।
तभी सास की आँखे खुली! वो बहू पढ़ी लिखी थी, तार्किक थी, जागरूक थी,
तर्क और विवेक के सहारे बहू ने सास को जागृत कर दिया !
 

क्या हम भी पढ़े लिखे है ? अशिक्षित है या तार्किक ? और जागरूक है ?

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

भगवान को क्या चढ़ाएं


एक बार एक अजनबी किसी के घर गया। वह अंदर गया और मेहमान कक्ष मे बैठ गया। वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा। तो उसने वहा टंगी एक पेन्टिंग उतारी और जब घर का मालिक आया, उसने पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै आपके लिए लाया हुँ।
घर का मालिक, जिसे पता था कि यह मेरी चीज मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया !!!!!
अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट पा कर, जो कि पहले से ही उसका है, उस आदमी को खुश होना चाहिए ??
मेरे ख्याल से नहीं....
लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ भी करते है।
हम उन्हे रूपया, पैसा चढाते है और हर चीज जो उनकी ही बनाई  है, उन्हें भेंट करते हैं!
लेकिन मन मे भाव रखते है की ये चीज मै भगवान को दे रहा हूँ!
और सोचते हैं कि ईश्वर खुश हो जाएगें।
मूर्ख है हम!
हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब चीजो कि जरुरत नही।
अगर आप सच मे उन्हे कुछ देना चाहते हैं
तो अपनी श्रद्धा दीजिए,
उन्हे अपने हर एक श्वास मे याद कीजिये और
विश्वास मानिए प्रभु जरुर खुश होगा !!

। । अजब हैरान हूँ भगवन
तुझे कैसे रिझाऊं मैं;
कोई वस्तु नहीं ऐसी
जिसे तुझ पर चढाऊं मैं ।। 
भगवान ने जवाब दिया :" संसार की हर वस्तु तुझे मैनें दी है।
तेरे पास अपनी चीज सिर्फ तेरा अहंकार है, जो मैनें नहीं दिया ।
उसी को तूं मेरे अर्पण कर दे। तेरा जीवन सफल हो जाएगा

रविवार, 19 जनवरी 2014

धन सफलता और प्रेम Short Beautiful Story


एक दिन एक औरत अपने घर के बाहर आई और उसने तीन संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।

औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
 

संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत ने कहा – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”
 

संत बोले – “हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।”
शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब बताया।
 

औरत के पति ने कहा – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।”
 

औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा।
संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।”
 

“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है” – फ़िर दूसरे संतों की ओर 

इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
 

औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया।
 

उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला – “यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”
 

लेकिन उसकी पत्नी ने कहा – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।”
 

उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली – “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
 

“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”
प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे।

औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?”

उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं।